“काश”

करी थी कोशिश हमने भी करें ना ज़िक्र तुमसे कभी बातें जो ज़हन में थी मेरे रख लेते ताउम्र उनको वहीं। कोई उम्मीद भी ना थी ना ही थी कोई भी आस कोई वजह भी कहाँ थी कह देने को सारे राज़। ना था आसान कहना भी चुप रहना भी था मुश्किल बहुत हमने दिल … Continue reading “काश”

नियति!

नियति में था जिसके उड़ना वो भी बांधी गई कभी अपनों के हाथों कभी गैरों से वो काटी गई। बन्धनमुक्त हो जब वो उड़ी इस स्वच्छंद आकाश में सर उठा के उसने भी ये सोचा आज आज़ादी की रात है। हवा के एक झोंके से जो लड़खड़ाए उसके कदम इल्म हो चला उसको था बचे … Continue reading नियति!

गर साथ मिले!

ख़ामोश सी रहती है जुबां, अक्सर ये गिला करते हैं आप नज़रे जो करना चाहे बयां, समझने की कोशिश कहाँ करते हैं आप। कहीं ऐसा ना हो, आपके समझने तक बहुत देर हो जाए जो बात दिल कहना चाहता है, दिल ही में रह जाए। चाहती हूँ जो हसरतें मन में है मेरे आपके मन … Continue reading गर साथ मिले!

तन्हाई में!

तन्हाई में जब कभी, कुछ याद करता हूँ दिदार हो बस तेरा, मैं ये फ़रियाद करता हूँ । हर चेहरे में सूरत तेरी ही, तलाश करता हूँ हो ख़्वाबों में सही, तुझसे मुलाक़ात करता हूँ। फ़साना तेरा ही बयां, दिन रात करता हूँ हर लम्हा हर पल, तेरी ही बात करता हूँ। तुम हमराज़ हो … Continue reading तन्हाई में!

The Moon In The Sky!

The Journey commences on a glorious night with full moon hanging in the sky accompanied by thousands of bright twinkling stars. It was absolutely dark inside the bus, as the curtains rolling down the windows, veiled even the glimpse of intensely magical moonlight. All the co-passengers were in deep sleep, oblivious to the splendid view outside … Continue reading The Moon In The Sky!

वीरांगना!

उनके संग देखे थे कुछ सपने होगी ज़िन्दगी हसीन, मिलकर मुस्कुराएँगे । दुश्मनों के हमले ने छलनी किया जब हमको निकल पड़े वो वादा करके, जल्दी लौट आएँगे । फिर लौटें चाहे वर्दी में या आएँ तिरंगे में लिपटे उत्सव जीत का हमारी, सब जरुर मनाएँगे। देश की रक्षा के लिए चल पड़े जो अग्निपथ … Continue reading वीरांगना!

औरत!

है ऐतबार ख़ुद पर उम्मीद दिल में लिए फिरती हूँ सजा के अधूरे सपने इन आँखों में सारी-सारी रात जगा करती हूँ। ख़्वाब से हक़ीक़त हक़ीक़त से फिर कुछ नए ख़्वाब बुनती हूँ कोरे कागज़ पर हर रोज़ कुछ नए रंग भरती हूँ। हाँ मैं औरत हूँ और औरत होने का हर फर्ज़ अदा करती … Continue reading औरत!

बदले बदले से लगते हैं!

पहले सोचा करते थे दुनिया के बारे में अब ख़ुद ही से फुरसत नहीं निकाल पाते हैं लगा लेते थे जो अनकही बातों को कभी दिल से आज सिर्फ़ ख़ुशफहमियों में ही जिन्दा रहते हैं। पहले ख़्वाहिशें थी फूलों का गुलिस्तां बनाने की अब दिल्लगी वो काटों से भी कर लिया करते हैं कभी हर … Continue reading बदले बदले से लगते हैं!